Loading…
Loading…
जब Dtrack मैलवेयर ने भारत के सबसे बड़े परमाणु संयंत्र में सेंध लगाई, तो इसने एयर-गैप के भ्रम को तोड़ दिया। जानिए यह कैसे हुआ और दिल्ली इस तरह की आपदा को रोकने के लिए क्या कर रही है।

तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु रिएक्टरों की शांत गूंज एक बड़ी जिम्मेदारी संभालती है: भारत के दक्षिणी ग्रिड के लिए 2000 मेगावाट बेस-लोड बिजली का उत्पादन करना। लेकिन 2019 के अंत में, भारत के सबसे बड़े परमाणु संयंत्र के प्रशासनिक नेटवर्क के भीतर एक अलग तरह का सिग्नल गूंजता हुआ पाया गया। दुर्भावनापूर्ण कोड का एक टुकड़ा, जिसे बाद में Dtrack मैलवेयर के रूप में पहचाना गया, ने चुपचाप सुरक्षा प्रणालियों को बायपास कर दिया था, जिससे दिल्ली के सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया और हमारे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) के शुरुआती इनकार सार्वजनिक जांच के सामने टिक नहीं पाए। 29 अक्टूबर, 2019 को, स्वतंत्र साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं ने संकेत दिया कि संयंत्र का एक डोमेन कंट्रोलर उत्तर कोरियाई साइबर-जासूसी समूहों से जुड़े बाहरी सर्वरों के साथ संचार कर रहा था। अगले दिन तक, दिल्ली के अधिकारियों ने स्वीकार किया कि वास्तव में सेंधमारी हुई थी, हालांकि उन्होंने जनता को आश्वस्त करने की कोशिश की कि परिचालन नियंत्रण प्रणालियां (operational control systems) भौतिक रूप से अलग (air-gapped) थीं।
यह अलगाव, जिसे एयर-गैप (air-gap) के रूप में जाना जाता है, परमाणु सुविधाओं के लिए सुरक्षा की अंतिम पंक्ति है। हालांकि, इस सेंधमारी ने साबित कर दिया कि एयर-गैप्ड सुविधाएं भी मानवीय भूल के प्रति संवेदनशील हैं। एक संक्रमित यूएसबी ड्राइव या प्रशासनिक कंप्यूटर पर भेजा गया एक स्पीयर-फिशिंग ईमेल इस अंतर को पाट सकता है, जिससे मैलवेयर को नेटवर्क के लेआउट के बारे में जानकारी जुटाने में मदद मिलती है।
"एयर-गैप का भ्रम अब टूट चुका है। यदि कोई सिस्टम मानव ऑपरेटरों पर निर्भर करता है, तो उसमें एक भौतिक पुल होता है जिसे चालाक मैलवेयर पार कर सकता है।"
इस अत्यधिक विशिष्ट स्पाइवेयर ने एक उच्च-सुरक्षा क्षेत्र में कैसे प्रवेश किया? Dtrack एक परिष्कृत ट्रोजन है जिसे कीलॉगिंग करने, ब्राउज़र इतिहास प्राप्त करने और नेटवर्क टोपोलॉजी के लिए होस्ट सिस्टम को स्कैन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह नष्ट नहीं करता; यह केवल निगरानी करता है।
📌 मुख्य बिंदु: हैकर्स ने रिएक्टर कोर को नुकसान पहुंचाने या मेल्टडाउन के लिए निशाना नहीं बनाया था, बल्कि भविष्य के फायदे के लिए भारत के ऊर्जा बुनियादी ढांचे का नक्शा तैयार करने के लिए ऐसा किया था।
दिल्ली के सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि हमलावरों ने सिस्टम कॉन्फ़िगरेशन और क्रेडेंशियल चुराए थे। यह खुफिया जानकारी जुटाने का अभियान किसी साधारण सिस्टम क्रैश से कहीं अधिक खतरनाक है। यह भू-राजनीतिक संकट के दौरान एक समन्वित हमले की नींव रखता है, जिससे साइबर सुरक्षा राष्ट्रीय रक्षा का एक मुख्य स्तंभ बन जाती है।
यह सुरक्षा उल्लंघन भारत के सामने एक स्पष्ट विकल्प छोड़ता है। क्या हम इस पुराने अनुमान पर भरोसा करना जारी रखेंगे कि भौतिक अलगाव ही पूर्ण सुरक्षा है, या हम सभी उपयोगिता नेटवर्क में ज़ीरो-ट्रस्ट मॉडल को अपनाएंगे? चूंकि देश बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए अपनी परमाणु क्षमता का विस्तार करने की योजना बना रहा है, अगला साइबर हमला प्रशासनिक फ़ायरवॉल पर नहीं रुकेगा।
संयंत्र के एक प्रशासनिक कंप्यूटर में **Dtrack** मैलवेयर का संक्रमण हो गया था, जिससे आंतरिक नेटवर्क डेटा तक अनधिकृत पहुंच प्राप्त हो गई थी।
इसे शेयर करें
यह लेख उपयोगी लगा? अपने दोस्तों के साथ शेयर करें।
Rate this article
Leave a comment
संबंधित विषय
आपको यह भी पसंद आएगा
आपके लिए चुनी गई खबरें

एक पोलिश दृष्टिकोण से पता चलता है कि आधुनिक वैश्विक निर्भरता का मतलब है कि अमेरिकी उपभोक्ता और नीति निर्माता अब संघर्षों और आपूर्ति की कमी को अलग-थलग घटनाओं के रूप में नहीं मान सकते हैं।





Enjoy this article?
Get fresh stories delivered to your inbox every morning.